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सेंदर  पर्व: पुरुषों के पारंपरिक वेश में शिकार के लिए निकलती हैं आदिवासी महिलाएं, सदियों पुरानी परंपरा बदली

Sendra Festival- सेंदरा पर्व आदिवासी संस्कृति, प्रकृति के प्रति प्रेम और सामुदायिक एकता का एक अद्भुत प्रतीक है। आदिवासी समाज की महिलाएं और पुरुष पर साल सेंदरा पर्व मनाने के लिए जंगलों में शिकार के लिए निकलते हैं। लेकिन इस बार सदियों पुरानी परंपरा बदली नजर आईं, आदिवासी समाज की महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग पारंपरिक हथियारों के साथ घर से जंगल की ओर निकले जरूर, लेकिन इस बार शिकार छोड़ कर जानवरों की पूजा कर उनकी जान बचाई।

जमशेदपुरः झारखंड के पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां की सीमाओं पर फैले 190 किलोमीटर के विस्तृत दलमा वन्यजीव अभयारण्य ( Dalma Wildlife Sanctuary ) में सोमवार को पारंपरिक सेंदरा पर्व ( Sendra Festival ) हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। सदियों पुरानी इस परंपरा में इस बार एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव देखने को मिला। ओडिशा, पश्चिम बंगाल और कोल्हान के हजारों आदिवासियों ने जंगल में प्रवेश तो किया, लेकिन वन्यजीवों का शिकार करने के बजाय उनकी रक्षा का संकल्प दोहराया।

पुरुषों के पारंपरिक वेश में निकलती हैं महिलाएं

दरअसल सेंदरा पर्व को स्थानीय लोग 'जनी शिकार' के नाम से भी जानते हैं। इस पर्व में महिलाएं अपने घरों से पुरुषों के पारंपरिक वेश में निकलती हैं। इसे लेकर पूरे इलाके में एक पुरानी कहानी काफी प्रचलित हैं। इसके तहत एक गांव पर कोई बाहरी संकट (जैसे जमीन हड़पने वाले या कोई अन्य खतरा) आता है। पुरुष जब विफल हो जाते हैं, तब गांव की महिलाएं सेंदरा के अनुष्ठानिक वेश में निकलकर अपनी बुद्धिमत्ता और साहस से गांव को बचाती हैं।

जल, जंगल, जमीन और जानवर की रक्षा का संदेश

दूसरी कहानी के तहत सेंदरा पर्व पर आदिवासी युवा और बुजुर्ग अपने पारंपरिक हथियारों के साथ दलमा राजा की पूजा के लिए निकलते हैं। इसी परंपरा के तहत पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां जिले के हजारों की संख्या में आदिवासी युवा और बुजुर्ग रविवार सुबह होते ही अपने पारंपरिक हथियारों के साथ दलमा राजा की पूजा कर पहाड़ों पर चढ़े।

हालांकि, इस बार वन विभाग और सरकार की अपील का व्यापक असर दिखा। सेंदरा वीरों ने कहा कि उनकी परंपरा जानवरों की हत्या करना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाना है। सोनू टुडू और महेंद्र महतो जैसे सेंदरा वीरों ने बताया कि वे अपनी संस्कृति को बचाने के लिए जंगल जाते हैं, और हथियार केवल आत्मरक्षा के लिए होते हैं।

पति के लौटने तक नहीं करतीं श्रृंगार

सेंदरा पर्व की एक अद्भुत परंपरा महिलाओं से भी जुड़ी है। आदिवासी समाज की सबिता सोरेन ने बताया कि जब तक परिवार के पुरुष सेंदरा (शिकार) के लिए जंगल में रहते हैं, तब तक घर की महिलाएं अपना सारा श्रृंगार त्याग देती हैं। यहां तक कि वे अपनी मांग से सिंदूर भी हटा देती हैं और पुरुषों के सुरक्षित वापस लौटने के बाद ही पुनः श्रृंगार करती हैं। यह परंपरा पूर्वजों के समय से चली आ रही है।

500 जवानों की तैनाती,15 जगहों पर चेकपोस्ट बनाए गए

जानवरों को सुरक्षित रखने के लिए वन विभाग ने 500 जवानों की तैनाती की थी और 15 जगहों पर चेकपोस्ट बनाए गए थे। दलमा रेंजर दिनेश चंद्र ने खुद सेंदरा वीरों का फूल-माला पहनाकर स्वागत किया। उन्होंने शिकार न करने पर आदिवासियों को बधाई दी। वन विभाग की ओर से चलाए गए जागरूकता अभियान का ही परिणाम था कि इस बार दलमा में खून की एक बूंद भी नहीं बही।

अधिकारियों ने जताया आभार

डीएफओ सब्बा आलम और आरसीएफ स्मिता पंकज ने बताया कि सीसीटीवी कैमरों और ड्रोन के जरिए निगरानी रखी जा रही थी। ग्रामीणों को यह समझाया गया था कि अगर जंगल में जानवर सुरक्षित रहेंगे, तभी सैलानी आएंगे और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। वन विभाग ने आदिवासी समाज के इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए उनका दिल से धन्यवाद किया है।

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